क्या देख रहे हो?

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मन की व्यथा जितनी भी हो
गवाह हमारा तन नहीं होगा
माना आँखों के कोनों से रिसती रही बूँदें रात भर
मग़र अगले पहर ये कोना नम नहीं होगा
बख़ूबी सीख लिया है मुस्कान का आडम्बर
तुम्हारी महफ़िल का उजियारा कम नहीं होगा 
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क्या देख रहे हो?

ह्रदय में टीस जितनी भी उठे
बेकल हमारा मन नहीं होगा
माना देर तलक गेसुओं से भीगती रही चूनर
मग़र अगले पहर ये गिला अहम नहीं होगा
बख़ूबी देख लिया है आप ही संभल कर
तुम्हारी बाहों में आसरे का भरम नहीं होगा
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क्या देख रहे हो?

हाथों की लकीरें जैसी भी हों
नसीब में हमारा मिलन नहीं होगा
माना मय के प्यालों में घुलती रही लज़्ज़्त ए ग़म
मग़र अगले पहर ये नासूर ज़खम नहीं होगा
बख़ूबी नाप लिया है इस चाहत का समंदर
तुम्हारी मोहब्बत से तो ख़ाक मरहम नहीं होगा
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क्या देख रहे हो?

फ़ुर्क़त के दिन जैसे भी हो
हाल हमारा बेकफ़न नहीं होगा
माना परतों में खुलती रही हसरतों की चुभन
मग़र अगले पहर आरजुओं का सितम नहीं होगा
बख़ूबी समझ लिया है तुम्हें, ओ शब्दों के सौदाग़र
तुम्हारी क़लम से तो ये क़िस्सा ख़तम नहीं होगा

क्या देख रहे हो?

बख़ूबी निभा लिया है तन्हा ये सफ़र
क्या हो गया ग़र
हमनफ़स हमारा हम-क़दम नहीं होगा

© अपूर्वा बोरा​

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