क्या

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वक़्त के आगे ज़ोर किसी का चलता है क्या
हालात बदल जाने से नसीब बदलता है क्या

महफ़िल में दिलकश चेहरों का मेला लगा है
मोहसिन का दिल भी हुस्न से पिघलता है क्या

मोहब्बत में कितनों को राह भूलते देखा है
मग़र सियाना मुसाफ़िर भटकता है क्या

तेरी जल्वा-गरी ख़्वाबों तक ही ठीक है
यूँ क़लम से सरेआम क़त्ल करता है क्या

वो कहता हैं चिंगारी दोनों तरफ़ बराबर है
उससे पूछो मकां उसका भी जलता है क्या

तमाम आशिक़ मयकदों में मिला करते हैं
कोई जाम मोहब्बत से भरता है क्या

ज़िन्दगी का दांव इत्तिफ़ाक़न खेला है
फिर खेल के अंजाम से डरता है क्या

ये लौ भी वक़्त के साथ बुझने लगी है
पैग़ाम-ए-क़ज़ा से पहले मरता है क्या

वक़्त के आगे ज़ोर किसी का चलता है क्या
हालात बदल जाने से नसीब बदलता है क्या

© अपूर्वा बोरा​

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