माहताब

महबूब न बन सकी तू माहताब हो गई
हक़ीक़त न बन सकी तो ख़्वाब हो गई

लफ़्ज़ ज़ुबाँ की दहलीज़ पार न कर सके
मग़र निगाहों की गुफ़्तगू लाजवाब हो गई

शब भर हसरतों का बाज़ार गरम रहा
मोहसिन की नीयत भी ख़राब हो गई

हम मय-कदे की दहलीज़ से वापस लौट आये
जो तेरी एक नज़र से आब भी शराब हो गई

बाँहें खोले उस रोज़ क़ज़ा आई थी
तसव्वुर में जिस रोज़ तू बेनक़ाब हो गई

फ़ुरकत के दिन है और है उम्मीद-ए-वस्ल भी
लगता है बिस्मिल को मोहब्बत बेहिसाब हो गई

हम सा ग़म-नसीब भी जहान में होगा कहाँ

महबूब न बन सकी तू माहताब हो गई
हम सितारे बनने की जद्दोजहद में लगे रहे

और इधर तू चाँद से आफ़ताब हो गई

Glossary –

माहताब – चाँद
शब – रात
मोहसिन – भला इंसान
आब – जल
क़ज़ा – मौत
तसव्वुर – ख़याल
फ़ुरकत – विरह
उम्मीद ए वस्ल – मिलन की आस
बिस्मिल – घायल (मोहब्बत से)
ग़म नसीब – जिस की किस्मत में दुख लिखा हो
आफ़ताब – सूरज

© अपूर्वा बोरा​

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