मग़र

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उसकी आँखें में
उतर जाने को
जी चाहता है
मग़र ये वक़्त नहीं
मेरे साथ ना ही
हालात हैं इसलिए
भर तो जाती हूँ
उसकी आँखों में
मग़र आँसूओं में
छलक भी जाती हूँ

उसके होठों को
चूम लेने को
जी चाहता है
मग़र ये वक़्त नहीं
मेरे साथ ना ही
हालात हैं इसलिए
करीब तो जाती हूँ
उसके होठों के
मग़र मुस्कान में
बिखर भी जाती हूँ

उसके बदन से
लिपट जाने को
जी चाहता है
मग़र ये वक़्त नहीं
मेरे साथ ना ही
हालात हैं इसलिए
बाहें तो डालती हूँ
उसकी बाहों में
मग़र एक स्पर्श से
बहक भी जाती हूँ

उसके संग एक
रात बिताने को
जी चाहता है
मग़र ये वक़्त नहीं
मेरे साथ ना ही
हालात हैं इसलिए
मुलाक़ात तो करती हूँ
उससे शाम ढलने पर
मग़र चाँद आते ही
लौट भी जाती हूँ

उससे मोहब्बत
करने का एक बार
जी चाहता है
मग़र ये वक़्त नहीं
मेरे साथ ना ही
हालात हैं इसलिए
इकरार तो करती हूँ
उससे दिल खोलकर
मग़र इज़हार करने से
घबरा भी जाती हूँ

© अपूर्वा बोरा​

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