मैं

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तोड़े होंगे फ़ूल
राह में चलते हुए
तुमने भी कभी
अपनी मोहब्बत को
ख़त संग भेजा होगा
ये पैग़ाम भी तभी
गुज़रते वक़्त के साथ
किसी की किताब के
पन्ने महकाती हूँ अभी
जिसने खिलाईं तेरी यादें
माशूका के दिल में
ख़ुद मुरझा कर ही
मैं वो ग़ुलाब हूँ

लगाये होंगे जाम
किसी मय-ख़ाने में
तुमने भी कभी
अपनी मोहब्बत को
मदहोशी में भेजा होगा
ये पैग़ाम भी तभी
गुज़रते वक़्त के साथ
किसी के ग़मों को
भुलाती हूँ अभी
जिसने संभाली तेरी यादें
माशूका के दिल में
ख़ुद चूर हो कर ही
मैं वो शराब हूँ

जोड़े होंगे कल्पना
और हकीकत के तार
तुमने भी कभी
अपनी मोहब्बत को
यूँ ही भेजा होगा
ये पैग़ाम भी तभी
गुज़रते वक़्त के साथ
किसी के ख़यालों में
जागती हूँ अभी
जिसने दिखाई तेरी यादें
माशूका के दिल में
ख़ुद आँखे मूद कर ही
मैं वो ख़्वाब हूँ

की होगी गुफ़्तगू
कितने दफ़े महफ़िल
में तुमने भी कभी
अपनी मोहब्बत को
लिख भेजा होगा
ये पैग़ाम भी तभी
गुज़रते वक़्त के साथ
किसी के मन को
बहलाती हूँ अभी
जिसने सँवारी तेरी यादें
माशूका के दिल में
ख़ुद क्षीण होकर ही
मैं वो बात हूँ

काटी होंगी रातें
सिगरेट के धुएँ में
तुमने भी कभी
अपनी मोहब्बत को
बेसुध भेजा होगा
ये पैग़ाम भी तभी
गुज़रते वक़्त के साथ
किसी और की तलब
बुझाती हूँ अभी
जिसने सुलगाई तेरी यादें
माशूका के दिल में
ख़ुद बुझ कर ही
मैं वो रात हूँ

की होगी आशिक़ी
ख़ुद को लुटा कर
तुमने भी कभी
अपनी मोहब्बत को
उम्मीद से भेजा होगा
ये पैग़ाम भी तभी
गुज़रते वक़्त के साथ
किसी और का जी
धड़काती हूँ अभी
जिसने सजाई तेरी यादें
माशूका के दिल में
ख़ुद बिखर कर ही
मैं वो जज़्बात हूँ

© अपूर्वा बोरा​

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