मैं और तू

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मैं नदी किनारे टहल रही थी
जब एक तरंग सा उत्पन्न हुआ था तू
तट पर बंधी थी मेरी नैया
और मुझे प्रलोभन दे गया तू।

मैं मंझधार में नैया खे रही थी
जब एक भँवर सा उठा था तू
किनारे से दूर हुई मेरी नैया
और मुझे डुबा ले गया तू।

मैं भँवर में डूब रही थी
जब तेज़ लहर सा उमड़ा था तू
हिचकोले खा गयी मेरी नैया
और मुझे बहा ले गया तू।

मैं लहरों में बह रही थी
जब बिजली सा कौंधा था तू
अपरोहण से टूट गयी मेरी नैया
और मुझे अकेला छोड़ गया तू।

मैं अकेले ही तैर रही थी
जब माझी सा दिखा था तू
त्याग दी तूने भी अपनी नैया
और मुझमें विलीन हो गया तू।

© अपूर्वा बोरा​

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