मैं उसे बरसों से जानती थी

Photo by Jacques Perreault on Unsplash
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मैं उसे बरसों से जानती थी
कंधे पर कल का बोझ इतना था
कि कमर दुहरी हो चली थी
आँखों के नीचे स्याह घेरे थे
क्योंकि धुआँ ग़म तो भुला देता है
मग़र उसकी सूरत भुला नहीं पाता

कम उम्र में हादसे देखने वाले
अक़्सर वक़्त से पहले बढ़े हो जाते हैं
बड़े बड़े ख़्वाब बुनते तो हैं, मग़र
ज़िम्मेदारियों में उलझकर रह जाते हैं
दूर तक उम्मीद नज़र आती नहीं
फ़िर भी क़दम बढ़ाते चले जाते हैं
इनका हौसला भी चट्टानों सा होता है
हालात देख किस्मत से टकरा जाते हैं
दिल रोता है तो चुपचाप आँसू पी कर
महफ़िल अपनी मुस्कान से सजाते हैं
टूटा दिल
टूटा ख़्वाब
टूटी उम्मीद
लेकर
ये फ़िर किसी टूटे तारे से दिल लगाते हैं
जुड़ती नहीं है उनकी किस्मत की लकीरें
ये फ़िर दूर से ही इश्क़ निभाते हैं
कम उम्र में हादसे देखने वाले
अक़्सर वक़्त से पहले बढ़े हो जाते हैं

मैं उसे बरसों से जानती थी
हाल फ़िलहाल फ़िर मुलाकात हुई
पैरों में हालात की बेड़ियां थीं
और साथ था तन्हाई का साया
होठों में अब भी एक सिगरेट थी क्योंकि
चाहे धुआँ उसकी सूरत भुला नहीं पाता
कमसकम ग़म तो भुला देता है


© अपूर्वा बोरा​

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