मकान

एक मकान है मेरे गांव में
जिसे खड़ा
ईटों से न सही
पत्थरों से गया है

एक कमरा है उस मकान में
जिसे लीपा
रंगों से न सही
गोबर से गया है

एक झरोखा है उस मकान में
जिसे बनाया
कांच से न सही
जाली से गया है

एक चूल्हा है उस मकान में
जिसे जलाया
गैस से न सही
लकड़ी से गया है

एक माँ है उस मकान में
जिसे बुज़ुर्ग
उम्र ने न सही
अधूरी आस ने किया है

एक पिता है उस मकान में
जिसे कमज़ोर
भावनाओं ने न सही
समाज के तानों ने किया है

एक आंगन है उस मकान में
जिसे याद
मैंने न सही
उसने ज़रूर किया है

एक मकान है मेरे गांव में
जिसे सूना
वक़्त ने न सही
मेरे पलायन ने किया है

 © अपूर्वा बोरा

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