मालूम पड़ता है

सुबह चार बजे
कोई दस्तक देता
मालूम पड़ता है
यहां नींद आंखों के परे है
वहाँ वो मुझे जगाने की कोशिश करता
मालूम पड़ता है

सिरहाने की तकिया से
कानों को ढक लेना आसान
मालूम पड़ता है
यहाँ उसका चेहरा आँखों में छाया है
वहाँ वो पानी छपछपाने के लिए कहता
मालूम पड़ता है

मेरे फ़ोन भी अलार्म की 
आवाज़ देता
मालूम पड़ता है
यहाँ तलब है गरम चाय की
वहाँ वो कश खींचता
मालूम पड़ता है

सुबह चार बजे
कोई दस्तक देता
मालूम पड़ता है
यहां नींद आंखों के परे है
वहाँ वो मुझे जगाने की कोशिश करता
मालूम पड़ता है

यहाँ जीने का दिल है
वहाँ वो ज़िन्दगी काटता 
मालूम पड़ता है।

 © अपूर्वा बोरा

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