मेरा शरीर

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मैं
एक औरत
हाड़ मास की
पुतली नहीं
मेरा जिस्म
मनोरंजन का
साधन नहीं
मेरी मुस्कान
पास आने का
न्यौता नहीं
मेरा पहनावा
चरित्र का
प्रमाण नहीं
मेरी बुद्धि
हैरानी की
बात नहीं

मेरा शरीर
घर है मेरा
किसी की
जागीर नहीं

तो जब तुम
बिन इज़ाज़त
इस किवाड़
पर बार बार
दस्तक देकर
या मनचले से
कोई खिड़की
पर पत्थर फेंक
कर मारते हो

अपने वज़न
से मसलते हो
मेरी कमर को
और साथ ही
रौंद देते हो
आंगन में लगे
मेरे फूल

अपने हाथों
से एक पिंजरा
गले के दोनों
ओर बना कैद
कर लेते हो
मेरी साँसें

अपने पैरों
से फ़ैलाते हो
मेरी जांघों के
दायरे को और
दबा देते हो
मेरी आहें

अपने कानों
से सुन पाते हो
मेरी वेदना भरी
पुकार और फ़िर
अनसुना करते हो
मेरा इंकार

अपने नेत्रों
में भर लेते हो
मेरे बिखरे घर
का मंजर और
होंठों पर उंगली
रख माँग लेते हो
मेरी चुप्पी

अपनी मोहब्बत
कहते हो जिसे
उसे ही धमकाते
हो ये कहकर कि
“घर की बात
घर में ही दबा
लेनी चाहिए
मेरी हमसफ़र”

मेरा शरीर
घर है मेरा
तो क्यों तुम
अकस्मात
चले आते हो
बिन सोचे कि
घर में मेहमान
के स्वागत की
तैयारी है या नहीं
और कितनी
दरारों पर फ़िर
पेंट की चादर
चढ़ानी पड़ेगी
जिस पर तुम
फ़िर आज नहीं
तो कल दाग
लगा ही बैठोगे
और कितने दफ़े
ज़माने का गुस्सा
दिमाग से हाथों
के ज़रिये मेरे इन
गालों पर उतारोगे
और कितनी प्यास
है जो ज़बरदस्ती
की आड़ में मुझसे
बुझाते फिरोगे

मेरा शरीर
घर है मेरा
तो तुम्हारा
इस घर को
यूँ उजाड़ देना
अब सह नहीं पाती
एक महीने से कैद
में हूँ तो और किसी
से कह भी नहीं पाती
वो कहते हैं घर में रहोगे
सुरक्षित और भय रहित
और यहां कम्बख़्त रूह
भी तुमसे है घबराती
बेबसी भी ऐसी है कि
बाहर महामारी का खतरा है
और भीतर कम्बख़्त मौत
भी हर पल है मंडराती

डर कर भी क्या जियें
तो मरने की मज़ाल सही
ख़ामोश हम क्यों रहें
तो शब्दों का बवाल सही
कैद में ज़िंदगी गुज़रे
तो आज़ादी का ख़याल सही
हैं न जाने कितने पहरे
तो रुक जाने का मलाल सही

नई रोज़ है मैं फ़िर
एक बार दोहराऊंगी

मैं
एक औरत
हाड़ मास की
पुतली नहीं
मेरा जिस्म
मनोरंजन का
साधन नहीं
मेरी मुस्कान
पास आने का
न्यौता नहीं
मेरा पहनावा
चरित्र का
प्रमाण नहीं
मेरी बुद्धि
हैरानी की
बात नहीं

और मेरा शरीर
घर है मेरा
किसी की
जागीर नहीं

© अपूर्वा बोरा​

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