मेरी आंखें

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मेरी आंखें झील सी गहरी नहीं
गहरा है मेरे अंदर समाया हुआ सन्नाटा।
यह मत कहना।
लड़कियों के मुँह से यह बातें अच्छी नहीं लगती।
या अच्छे घर की लड़कियां ऐसा नहीं कहती।
कैसे संस्कार दिए होंगे इसे इसके माँ-बाप ने।
जवाब देना तुम्हें शोभा नहीं देता।
और उन चार लोगों की चार बातें सुन
अपने विचारों के, तरीकों के, और सोच के घूंट पीते पीते
सन्नाटे का एक विशाल समुद्र घर चुका है मेरे अंदर
मेरी आंखें झील सी गहरी नहीं
गहरा है मेरे अंदर समाया हुआ सन्नाटा।

मेरे होंठ गुलाब से सुर्ख़ नहीं
सुर्ख़ है मेरे दिल में छिपा हुआ दर्द।
यह मत कहना।
भीड़ में जानबूझकर अनजाने से टकराने वाले लोग।
या गली से गुज़रते हुए उन बेशर्म आँखों का निवाला बनना।
कभी हमें भी तो मौका दो जानेमन जैसे अश्लील व्यंग्य सुनना
या संकरी सी सड़क पर वो अनचाहा सा एहसास।
उन चार लोगों की चार हरकतें देख
अपने आत्मविश्वास की, स्वाभिमान की और चीखों की घूंट पीते पीते
दर्द का एक विशाल समुद्र घर चुका है मेरे अंदर
मेरे होंठ गुलाब से सुर्ख़ नहीं
सुर्ख़ है मेरे दिल में छिपा हुआ दर्द।

मेरा चेहरा चाँद सा रोशन नहीं
रोशन है मेरे ज़हन में बंद जुनून।
क्यों नहीं कुछ कहना?
क्यों नहीं कुछ करना?
क्यों नहीं कुछ पहनना?
क्यों नहीं कुछ पूछना?
आखिर क्यों नहीं बगावत करना?
जीवन भर इन्हीं चार लोगों के डर से अपने आप को समाज से छिपाते हैं हम
फिर इन्हीं चार लोगों के किये धरे का परिणाम सहते हैं हम
मेरा चेहरा चाँद सा रोशन नहीं
रोशन है मेरे ज़हन में बंद जुनून।

मेरी ज़ुल्फ़ें मेरी तरह कैद नहीं
आज़ाद हैं मेरे ख़्वाबों की तरह।
क्यों नही सपनें बनूं?
क्यों नहीं अपने रास्ते खुद चुनूं?
क्यों नहीं मुश्किलों ने ना डरूँ?
क्यों नहीं जिंदगी जियूँ?
आखिर क्यों नहीं ख्वाबों को पूरा करूँ?
जीवन भर इन्हीं चार लोगों के डर से अपने वजूद को समेटेंगे हम
फिर इन्हीं चार लोगों के तानों का प्रकोप सहेंगे हम
मेरी ज़ुल्फें मेरी तरह कैद नहीं
आज़ाद हैं मेरे ख़्वाबों की तरह।

 © अपूर्वा बोरा

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