मोहब्बत करो

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‘चीज़’ टूटी तो उसे जोड़ने की रहमत करो
मैं ‘इंसान’ हूँ, मुझसे बस मोहब्बत करो

फ़ूल टूटा तो उसकी माला बना दी
माला बिखरी तो पूजाघर में सजा दी
सिलाई उधड़ी तो धागा सुई चला दी
किताब फ़टी तो जिल्दबन्दी करा दी
सिलवटें बनीं तो इस्त्री कर मिटा दीं
दरारें बनीं तो पोटीन की चादर चढ़ा दीं

‘चीज़’ टूटी तो उसे जोड़ने की रहमत करो
मैं ‘इंसान’ हूँ, मुझसे बस मोहब्बत करो

टूटने के डर से चीज़ें लेना नहीं छोड़ते
फ़िर दिल टूटने से क्यों डरते हो?
मंज़िल देख सफ़र से मुकरते हो
तो ये प्यार नहीं सौदा करते हो
डर इतना कि घुटकर जी नहीं पाते
तो इस कदर तन्हा क्यों मरते हो?
सोच समझकर दिल लगाते हो गर
तो ये कैसी मोहब्बत करते हो?

‘चीज़’ टूटी तो उसे जोड़ने की रहमत करो
मैं ‘इंसान’ हूँ, मुझसे बस मोहब्बत करो

मेरे अतीत से खिलवाड़ न करो
मेरे चरित्र पर सवाल न करो
मेरे आँसूओं को रोका न करो
मेरे फ़ैसलों पर टोका न करो
मेरे गम का हिसाब न करो
मेरे ज़ख़्म को कुरेदा न करो

मैं तुम्हारी कहानी की अबला नहीं
मुझे बचाने की कोशिश न करो
मैं तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं
मुझे संभालने की कोशिश न करो
मैं तुम्हारे कल का पश्चाताप नहीं
मुझे राह दिखाने की कोशिश न करो
मैं तुम्हारे घर का टूटा सामान नहीं
मुझे फ़िर जोड़ने की कोशिश न करो

मेरा दिल टूट चुका है पहले भी
इसे जोड़ने की रहमत न करो
कर सकते हो मुझसे प्यार तो
मेरे यार मुझसे बस मोहब्बत करो

‘चीज़’ टूटी तो उसे जोड़ने की रहमत करो
मैं ‘इंसान’ हूँ, मुझसे बस मोहब्बत करो

© अपूर्वा बोरा​

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