नन्हीं अपूर्वा

Photo by Jeremy Bishop on Unsplash

नन्हीं अपूर्वा,

कभी आज़ाद तो
कभी दायरे में रहती हूँ
कभी तुम सी तो
कभी खुद सी होती हूँ

मैंने तुम्हें कुछ
बरस पहले बस में
खुले बालों में देखा था
हवा के झोंकें से
तुम्हारी ज़ुल्फ़ का एक कतरा
तुम्हारी आँखों को
परेशान कर रहा था
जिसे तुम हौले से
अपने कान के पीछे
धकेल रही थी
और वह कमबख़्त ज़ुल्फ़ थी
जो न तुम्हें चैन से जीने दे रही थी
न मुझे

अनजाने में
भौंहें तानकर
कभी नज़रें भींचकर
बेचैनी में तुम अपने
दांत से
बड़े ही हौले से
नीचे वाला होंठ
दबा रही थी
और वह कमबख़्त अदा थी
जो न तुम्हें बेचैनी से रिहा कर रही थी
न मुझे

आंखों में काजल सजाये हुए
और जिस्म पर
गुलाबी इत्र छिड़के हुए
तुम किसी के
आने का हौले से 
बस में
इंतज़ार कर रही थी
और यह कमबख़्त वक़्त था
जो न तुमसे कट रहा था
न मुझसे।

जब ऐसे किस्से
रोज़ाना 
गीतों में
कहानियों में
कविताओं में
दोहराये जाते थे

तो अक्सर
खुद पर ही
सवाल उठाती थी मैं

आखिर गर्मी में घुंघराले बालों को
जूड़े में कैद करने वाले चेहरे पर
कविता लिखता कौन है?

आखिर बेचैनी में दुनिया से छिप
जाने वाले चेहरे पर
कविता लिखता कौन है?

आखिर इंतज़ार की घड़ी बीतने पर
आगे बढ़ जाने वाले चेहरे पर
कविता लिखता कौन है?

जब ऐसे किस्से
रोज़ाना 
गीतों में
कहानियों में
कविताओं में
दोहराये नहीं जाते

तो अक्सर
अपने ही लिए
जवाब तराशती हूँ मैं

इसलिए जब वे कहते हैं
मैं कविताएं तुम्हारे लिए लिखती हूँ
उन्हें ये कैसे समझाऊं कि
कविताओं में तुम्हें ही लिखती हूँ?

इसलिए जब वे कहते हैं
तुम शायद प्रेरणा हो मेरी कविता की
उन्हें ये कैसे समझाऊं
कि तुम ही हो कविता मेरी

कभी आज़ाद तो
कभी दायरे में रहती हूँ
कभी तुम सी तो
कभी खुद सी होती हूँ

स्नेह,
थोड़ी बड़ी अपूर्वा

 © अपूर्वा बोरा

Leave a Reply

Close Menu