नक़ाब

तस्वीरों में अपनी कहानियां छिपा दो
अदाओं में अपनी खामियां छिपा दो

रोज़ाना की छोटी कुर्बानियां छिपा दो
पुराने घावों की निशानियां छिपा दो

अपनों की बेईमानियां छिपा दो
और गैरों से अपनी नादानियाँ छिपा दो

आँखों में दर्द झलकता है
तो उसपर चश्मे लगा दो

चेहरा खुली किताब है
तो जुल्फों का पर्दा गिरा दो

दिल अगर रोता है
तो धीरे से मुस्कुरा दो

ज़ख्म अगर पुराने हैं
तो उसपर लिबास नया चढ़ा दो

हौसला फीका पड़ रहा है
तो रूप रंग का तड़का लगा दो

अपनी जंग यूँ ही अकेले लड़नी है
तो चेहरे को एक नक़ाब और पहना दो।

 © अपूर्वा बोरा

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