नसीब

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हमारे शहर से गुज़रे बिन आवाज़ तो यही सही
नसीब में वस्ल की सूरत नहीं तो क्या किया जाये

जो मंज़ूर है ये आलम उन्हें भी तो यही सही
हाल फ़िलहाल अब यूँ ही जिया जाये
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नदामत की राह है तो यही सही
उनसे अनजाने में ही नज़र मिल जाये
बस, उनकी सलामती की ख़बर मिल जाये
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दीवानों के हुज़ूम में नहीं तो न सही
उनका अक़्स ख़्वाबों में ही मिल जाये
बस, उनकी ज़ुबां में ज़िक्र हमें मिल जाये
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जुस्तजू में न भटक सके तो यही सही
उनके नग़मों की ही सौग़ात मिल जाये
बस, उन संग गुफ़्तगू भरी एक रात मिल जाये
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जीवन भर का साथ मुमकिन नहीं तो न सही
उनके आग़ोश में दो घड़ी पनाह मिल जाये
बस, उनकी मोहब्बत भरी निगाह मिल जाये
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एवज़ में हिज़्र की ने’मत मिले तो यही सही
उनकी एक पल की चाहत ही मिल जाये
फ़िर चाहे रुख़सत की इजाज़त मिल जाये
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हमारे शहर से गुज़रे बिन आवाज़ तो यही सही
नसीब में वस्ल की सूरत नहीं तो क्या किया जाये

जो रुख़सत की इजाज़त मिले तो यही सही
हाल फ़िलहाल अब यूँ ही जिया जाये

© अपूर्वा बोरा​

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