नज़रों का खेल

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हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे
आपने तो गुज़ारी केवल एक शाम हमारे साथ
हम उस शाम के सहारे पूरी ज़िन्दगी बिता बैठे

हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे

हम ख़ामोशी में आँखों से बातें हज़ार कर बैठे
आपने तो निकाली म्यान से तलवार यूँ मुस्कुरा कर
हम बेपनाह दिल उसकी खिदमत में पेश कर बैठे

हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे

हम कल की आरज़ू में आज की बेसब्री मिटा बैठे
आपने तो सोच कर बिछाई थी शतरंज की बिसात
हम उस जीती हुई बाज़ी को जानबूझकर हार बैठे

हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे

हम लफ़्ज़ों से दिल का हाल सरेआम जता बैठे
आपने तो कहा इक़रार के लिए ज़रूरी नहीं इज़हार
हम उस वायदे के सहारे ये बेनाम रिश्ता भी निभा बैठे

हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे

हम ख़्वाबों की नगरी में एक नया घर बना बैठे
आपने तो थामा एक पल के लिए हमारा हाथ
हम उस साथ की उम्मीद में सब कुछ लुटा बैठे

हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे

हम मोहब्बत के बदले आपसे आपको माँग बैठे
आपने तो ऐसे ही कह दिया कि कर लेना इंतज़ार
हम उस हुक्म को अपने सिर आँखों पर सजा बैठे

हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे
आपने तो गुज़ारी केवल एक शाम हमारे साथ
हम उस शाम के सहारे पूरी ज़िन्दगी बिता बैठे

© अपूर्वा बोरा​

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