फिर किसी रोज़

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फिर किसी रोज़
कुछ कहानियाँ
कुछ क़िस्से
कुछ बातें
दोहराएँगे ज़रूर

फिर किसी रोज़
कोई नज़्म
कोई गीत
कोई नगमें
गुनगुनायेंगे ज़रूर

फिर किसी रोज़
कुछ वक़्त
कोई मुलाकात
कोई रात
गुज़ारेंगे ज़रूर

फिर किसी रोज़।

 © अपूर्वा बोरा

This Post Has 2 Comments

  1. Vagmi

    Phir kisi roz, in kahaniyon ko padh ke muskurayenge
    Phir kisi roz, in shabdo aur aawazon mei ghul jayenge.. !

    Read your writings after a long long time, and wondered why I couldn’t read them more often! You never stop to amaze me!

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