फिर क्यों

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ज़िन्दगी उधार पर नहीं ली है तुमने
फिर क्यों पल पल का हिसाब किए जा रहे हो?

मुस्कुराहट पर तो कोई लगान नहीं लगाता
फिर क्यों अपनी खुशी दूसरे की ज़िम्मेदारी बनाये जा रहे हो?

गमों का तो कर्ज़ा नहीं है तुम पर
फिर क्यों अपने आँसूओं से चुकाए जा रहे हो?

साँस लेने का काम तुम्हारा शरीर कर रहा है
फिर क्यों तुम धुएँ के छल्लों में उसे उड़ाए जा रहे हो?

कल की चिंता में आज डूबे हुए हो
फिर क्यों उसी के बोझ तले दबे जा रहे हो?

ज़िन्दगी तुम्हारी है तो उसकी रफ़्तार भी तुम्हारी होगी
फिर क्यों किसी और की दौड़ में भागे जा रहे हो?

ज़िन्दगी तुम्हारी है तो मंज़िल भी तुम चुनोगे
फिर क्यों भेड़चाल में शामिल हुए जा रहे हो?

ज़िन्दगी तुम्हारी है तो उस पर हक़ भी तुम्हारा होगा
फिर क्यों किसी और के मुताबिक़ जिए जा रहे हो?

ज़िन्दगी उधार पर नहीं ली है तुमने
फिर क्यों पल पल का हिसाब किए जा रहे हो?

 © अपूर्वा बोरा

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