प्रफुल्लित मन

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जैसे तेरी मुस्कुराहट

कुछ सुख
जिन्हें हम 
तलाशते नहीं
मगर, उनका हमसे
कुछ यूँ टकराना
कि प्रफुल्लित हो उठता है मन
जैसे बिन मौसम बरसात।

कुछ बारिशें
जिनसे हम
छिपते नहीं
मगर, उस बरसात का
हमारे बदन को
कुछ यूँ पिघलाना
कि सुलग उठता है मन
जैसे दोपहर की नींद।

कुछ करवटें
जिन्हें हम
लेते नहीं
मगर, उस नींद का
हमारे बदन को
कुछ यूँ फुसलाना
कि बहक उठता है मन
जैसे मिट्ठी की खुशबू।

कुछ रास्ते
जिन्हें हम
चुनते नहीं
मगर, उस खुशबू का
हमारे दिल को
कुछ यूँ लुभाना
कि चहक उठता है मन
जैसे पहाड़ों की चाय।

कुछ चुस्कियां
जिन्हें हम
बांटते नहीं
मगर, उस चाय का
हमारे दिल को
कुछ यूँ उकसाना
कि उत्साहित हो उठता है मन
जैसे तेरे घर का रास्ता।

कुछ इश्क़
जिसे हम
जताते नहीं
मगर, उस रास्ते का
हमारी मोहब्बत को
कुछ यूँ पुकारना
कि शरमा उठता है मन
जैसे तेरा चेहरा।

कुछ नज़ारे
जिन्हें हम
देखते नहीं
मगर, उस चेहरे का
हमारे ख़्वाबों में
कुछ यूँ चले आना
कि मचल उठता है मन
जैसे तेरी मुस्कुराहट।

कुछ सुख 
जिन्हें हम 
तलाशते नहीं
मगर, उनका हमसे
कुछ यूँ टकराना
कि प्रफुल्लित हो उठता है मन

 

 © अपूर्वा बोरा

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