प्रतिबिम्ब

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ये सामने कौन आ खड़ा हुआ है
जिसे मेरी नज़रें पहचानती नहीं
आईने में दिखता है जिसका प्रतिबिम्ब
उसकी सूरत मेरी सीरत से मेल खाती नहीं

ये कौनसा लिबास ओढ़ा हुआ है
जिसे मेरी काया संभाल पाती नहीं
तस्वीरों में कैद होता है जिसका चेहरा
उसकी हँसी मेरी उदासी से मेल खाती नहीं

ये कैसी ज़िद पर अड़ा हुआ है
जिसे मेरी कोशिशें डगमगाती नहीं
समाज में तोले जाते हैं जिसके सपनें
उसकी चाह मेरी राह से मेल खाती नहीं

ये किसने संवाद अधूरा छोड़ा हुआ है
जिसे मेरी बहसबाज़ी सही जाती नहीं
व्यवहार में झलकती है जिसकी सौम्यता
उसकी ख़ामोशी मेरी चीख़ से मेल खाती नहीं

ये किसका ह्रदय ज़ार ज़ार पड़ा हुआ है
जिसे मेरी चेतना समेटना जानती नहीं
आँसूओं से भीग रहीं हैं जिसकी पलकें
उसकी पीड़ा मेरी नब्ज़ से मेल खाती नहीं

ये किस कहानी से नाता जोड़ा हुआ है
जिसे मेरी ज़िन्दगी कुछ समझ आती नहीं
कागज़ में उतरती है प्रशस्त जो नायिका
उसकी जीत मेरी हार से मेल खाती नहीं

ये सामने कौन आ खड़ा हुआ है
जिसे मेरी नज़रें पहचानती नहीं
आईने में दिखता है जिसका प्रतिबिम्ब
उसकी सूरत मेरी सीरत से मेल खाती नहीं

© अपूर्वा बोरा​

This Post Has One Comment

  1. Justin

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