प्रतिवाद

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सवाल पूछना
तो ज़ुर्म नहीं है
फ़िर जवाब में
आवाज़ें क्यों दबाते हो?

आवाज़ उठाना
तो ज़ुर्म नहीं है
फ़िर किस ख़ातिर
लाठियां बरसाते हो?

हक माँगना
तो ज़ुर्म नहीं है
फ़िर जवाब में
हिंसा से क्यों धमकाते हो?

देश जितना तुम्हारा है
उतना ही हमारा भी है ना
फ़िर किस बुनियाद पर
हमें देशद्रोही ठहराते हो?

औरत हूँ तो खतरा है
अल्पसंख्यक हूँ तो खतरा है
दलित हूँ तो खतरा है
अलग धर्म की हूँ तो खतरा है
ट्रांस हूँ तो खतरा है
गरीब हूँ तो खतरा है
हर कोई खौफ़ में जी रहा है
फ़िर किस इंसानियत
पर ऐतबार फरमाते हो?

हम तो पोस्टर लेकर
घर से निकले थे
फ़िर किस डर से
हम पर गोलियाँ चलाते हो?

संयुक्त राष्ट्र का
पाठ पढ़ाने वाले
फ़िर किस कारण
अपनों को ही बांटते हो?

सवाल पूछना
तो ज़ुर्म नहीं है
फ़िर जवाब में
आवाज़ें क्यों दबाते हो?

आवाज़ उठाना
तो ज़ुर्म नहीं है
फ़िर किस ख़ातिर
लाठियां बरसाते हो?

हक माँगना
तो ज़ुर्म नहीं है
फ़िर जवाब में
हिंसा से क्यों धमकाते हो?

ये तो बताओ साहब
सब कर गुज़रने के बाद
कैसे खुद से रोज़ाना
नज़रें मिलाते हो?

 © अपूर्वा बोरा

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