प्रेरणा

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वो पूछते हैं
इस कला की
प्रेरणा कहाँ से
मिलती है मुझे

मैं उत्तर देती हूँ
कि कैसे हर एक
रोज़ नई होती है
हर रात के बाद
सहर कई होती है
हर कोशिश में कोई
छिपी उम्मीद होती है
हर हार के बाद नई
एक सीख होती है
और इन्हें क़रीब से
निहारते निहारते
मिल ही जाती है
मुझे प्रेरणा कोई
जो अक्सर उतर
आती है उभर कर
कला एक नई

वो पूछते हैं
इस कला की
प्रेरणा कहाँ से
मिलती है मुझे

मैं उत्तर देती हूँ
कि कैसे हर एक
राह नई होती है
हर अंत के बाद
शुरुआत नई होती है
हर चाहत में कोई
छिपी आह होती है
हर गम के बाद नई
एक मुस्कान होती है
और इन्हें क़रीब से
महसूस करते करते
मिल ही जाती है
मुझे प्रेरणा कोई
जो अक्सर उतर
आती है उभर कर
कला एक नई

वो पूछते हैं
इस कला की
प्रेरणा कहाँ से
मिलती है मुझे

कहने को तो
यही सब कहती हूँ
सच तो मगर है ये
कि पीड़ा का एक
विशाल समंदर है
उसकी गहराई में
दफ़न हैं दास्तां ए
मोहब्बत के गम
कुछ घाव हैं जो
वक़्त के मरहम
से भरे नहीं और
कांच से बिखरे
कुछ टुकड़े हैं जो
बेवक़्त नए ज़ख्म
दे जाते हैं कुछ ऐसे
कि उनके निशान फ़िर
मिट नहीं पा रहे हैं
सीने में आग लेकर
चलते थे जो अब
बुझती चिंगारी सी
जिंदगी जिये जा रहे हैं
कुछ हादसे ऐसे हैं कि
उनकी सज़ा आजतक
ख़ुद को दिए जा रहे हैं
लहू से रंग कर अपने
बदन के कुछ कोनों को
बेजान शरीर में प्राण
संचित किये जा रहे हैं
असहनीय से इस दर्द को
शब्दों में पिरोये जा रहे हैं
अपनी ज़िंदगी का बोझ
कागज़ पर उतारे जा रहे हैं

वो पूछते हैं
इस कला की
प्रेरणा कहाँ से
मिलती है मुझे

यहां हम अपनी बेबसी के इस आलम
को सरेआम नीलाम करते जा रहे है
और वहां वो इसे कला समझ
हमें कलाकार का दर्जा देते जा रहे हैं

© अपूर्वा बोरा​

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