रात पसर रही है

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रात पसर रही है
पीले बल्ब सी
जलती – बुझती 
कमबख़्त नींद 
आंखों में सुलग रही है

रात पसर रही है
अनंत सन्नाटे सी
चुभती – चीरती
कमबख़्त खामोशी
कानों को भेद रही है

रात पसर रही है
टूटे तारे सी
गिरती – चमकती
कमबख़्त उम्मीद
सब्र को परख रही है

रात पसर रही है
अधूरी कविता सी
लिखती – मिटती
कमबख़्त मोहब्बत
घर को तरस रही है

रात पसर रही है।

 © अपूर्वा बोरा

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