रात तन्हा

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नाउम्मीदी से कहो
ज़रा अगले पहर आये
अभी उदासी की बाहों
में खोए हैं हम
रात तन्हा न गुज़रेगी
जब गम सिरहाने रख
सोये हैं हम

उत्कंठा की चादर
ज़रा सिर तक ओढ़ो
अभी कोई पर्दे की ओट
से झाँक रहा है
रात तन्हा न गुज़रेगी
जब भीतर का कोलाहल
जाग रहा है

नींद के पहरेदारों से कहो
ज़रा दबे पाँव आये
अभी मय के नशे
में चूर हैं हम
रात तन्हा न गुज़रेगी
जब उनके ख़याल से
दूर हैं हम

ग़म की घूँट
ज़रा पी लेने दो
अभी कौन खुशियाँ
तोल रहा है
रात तन्हा न गुज़रेगी
जब अंतर्मन हमारा
बोल रहा है

अश्कों के बादल से कहो
ज़रा हौले से छाए
अभी पनाह ढूंढ़
रहे हैं हम
रात तन्हा न गुज़रेगी
जब आँखें मूँद
रहे हैं हम

स्वप्न की नगरी
ज़रा भटकने दो
अभी ज़माने में और
भी क़रार है
रात तन्हा न गुज़रेगी
अब नाउम्मीदी का
ही इंतज़ार है

नाउम्मीदी से कहो
ज़रा अगले पहर आये
अभी उदासी की बाहों
में खोए हैं हम
रात तन्हा न गुज़रेगी
जब गम सिरहाने रख
सोये हैं हम

© अपूर्वा बोरा​

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