रात

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अरे बुझा दो ये बत्ती
कि आँखों में चुभ
रही है

ये जो क़यामत की
रात है, काटे नहीं कट
रही है

मोगरे के फूल की
माला मेरे केशों में सज
रही है

उन्हें लगाने वाले
की नीयत भी फिसल
रही है

अरे गिरा दो ये पर्दे
कि ज़रूरत मिट
रही है

ये सीने की आग
आज, होठों पर मचल
रही है

गुलाब के इत्र की
महक मेरे बदन से झर
रही है

उसे चूमने वाले की
धड़कनें भी बढ़
रही है

अरे बिखरा दो ये ज़ुल्फ़ें
कि अब काबू खो
रही है

ये जो मोहब्बत की
बात है, होते नहीं हो
रही है

अरे बुझा दो ये बत्ती
कि आँखों में चुभ
रही है

ये जो क़यामत की
रात है, काटे नहीं कट
रही है

 © अपूर्वा बोरा

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