रक़ीब

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जी को
महफूज़ रख
तुम्हारे पास
और थमाती है
अपने लिबास की डोर
वो जब पुकार तुम्हें सनम

उसके तन से
अपनी दूरी
घटाते हुए
और रेशम की
परत ज़मीं पर
ढेर करते हुए
जब आँखों में
उतारते हो ये तस्वीर
तो क्या देखते हो अपनी
मन की आँखों से?

जिस तरह ये मेरे सामने
अपनी आबरू की डोर
मुझे थमाती है शायद मेरा
जी बहलाने के वास्ते शायद
उस तरह किसी और को भी
बहला सकती है या शायद
बहला चुकी थी या शायद
बहला रही है अभी भी शायद

लकीरों को
मरबूत कर
तुम्हारे साथ
और बढ़ाती है
अपने कदम तुम्हारी ओर
वो जब पुकार तुम्हें सनम

उसके तन को
अपनी नज़र से
तोलते हुए और
साथ ही हया का
पर्दा गिराते हुए
जब आँखों में
उतारते हो ये तस्वीर
तो क्या देखते हो
अपनी मन की आँखों से?

जिस तरह ये मेरे सामने
आश्कार कर अपने क़दम
मुझ तक बढ़ाती है शायद मेरा
जी बहलाने के वास्ते शायद
उस तरह किसी और को भी
बहला सकती है या शायद
बहला चुकी थी या शायद
बहला रही है अभी भी शायद

इश्तिहा को
क़बूल कर
तुम्हारे ख़ातिर
और बिछाती है
अपने जिस्म का हर छोर
वो जब पुकार तुम्हें सनम

उसके तन को
अपनी उंगलियों
से सहलाते हुए
और होठों के
चुंबन से उसे
लजाते हुए
जब आँखों में
उतारते हो ये तस्वीर
तो क्या देखते हो
अपनी मन की आँखों से?

जिस तरह ये मेरे सामने
अपनी रग्बत से बेझिझक
मुझे रिझाती है शायद मेरा
जी बहलाने के वास्ते शायद
उस तरह किसी और को भी
बहला सकती है या शायद
बहला चुकी थी या शायद
बहला रही है अभी भी शायद

मोहब्बत की
दास्तां कर
तुम्हारे नाम
और उठाती है
अपने सीने में एक शोर
वो जब पुकार तुम्हें सनम

उसके तन को
अपने मन में
समाते हुए और
ह्रदय का भार
उससे बाँटते हुए
जब आँखों में
उतारते हो ये तस्वीर
तो क्या देखते हो
अपनी मन की आँखों से?

जिस तरह ये मेरे सामने
अपनी मोहब्बत का पैग़ाम
मुझे सुनाती है शायद मेरा
जी बहलाने के वास्ते शायद
उस तरह किसी और को भी
बहला सकती है या शायद
बहला चुकी थी या शायद
बहला रही है अभी भी शायद

यही सोचते सोचते
उसकी हर बात पर यूँ ही
गौर फरमाते फरमाते
उसकी हलचल पर यूँ ही
सवाल उठाते उठाते
रक़ीब के तन्हाई में यूँ ही
ख़याल पकाते पकाते
रश्क़ में बैठोगे यूँ ही
सुध बुध भुलाते भुलाते
ये चिंगारी से आग बनेगी यूँ ही
थक जाओगे बुझाते बुझाते
ख़ुद को रक़ीब बना बैठोगे यूँ ही
उसके चरित्र पर दाग लगाते लगाते

जी को
महफूज़ रख
अपने पास
लकीरों को मिटा
अपने हाथों की
इश्तिहा को अपने
होठों से दबा और
कर अपनी
मोहब्बत को
चारदीवारी में कैद
कर बैठेगी
तुम्हारी शक
भरी नज़रों
से आज़ाद

© अपूर्वा बोरा​

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