साथ

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जिस्म में
तेरी महक
का इतर
लगा कर
लटों में
तेरे इश्क़
का ग़ुलाब
सजा कर
आँखों में
तेरे चेहरे
की तस्वीर
नुमा कर
सीने में
तेरी साँसों
का हाल
बयां कर

तेरी रोशनी में
मैं खिलती हूँ ऐसे
तू चाँद है तो
मैं रात हूँ वैसे
तेरी आरज़ू में
मैं भीगती हूँ ऐसे
तू सावन है तो
मैं बरसात हूँ वैसे
तेरी मोहब्बत में
मैं सँवरती हूँ ऐसे
तू रचयिता है तो
मैं क़ायनात हूँ वैसे
सुलगते हैं जुदाई में
हम तुम ठीक ऐसे
क़यामत की ये रात
तन्हा गुज़ारेंगे कैसे

ख़्वाब में
तेरे मिलन
की आस
लगा कर

ह्रदय में
तेरी नज़दीकी
का एहसास
जगा कर

मैं माँगू
तेरा साथ
सजदे में
तेरे नाम
की दुआ
अदा कर

© अपूर्वा बोरा​

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