सच

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उसे ख़ुद से शिकायत है तो बस इतनी ही
कि वक़्त रहते सच बयां न कर सकी
सच सामने नहीं ला पाते हैं जो अक्सर
जूझा करते हैं उस से ताउम्र अकेले ही

डबडबाई आंखें हों उसपर मुस्कान हो झूठी
जिस्म से परे झांकता है आजकल कौन ही
ज़ख़्म आँखों से नहीं दिखते जो अक्सर
सह लेते हैं उस दर्द को ख़ामोश रहकर ही

वास्ता होता है क़सूरवार से उसका जब कभी
साँस जवाब दे जाती है और काँपती है रूह भी
अतीत के साये तले जीते हैं जो अक्सर
बैर रखते हैं सुकून भरी नींद से आज भी

प्रतिशोध की ज्वाला धधकती है भीतर ही
भींच कर मुट्ठियों को क़ैद करते हैं हौसला भी
सन्नाटे को चीर नहीं पाते हैं अल्फ़ाज़ जो अक्सर
चीख़ते हैं उस दरिंदे का नाम ख़ामोश जुबां से ही

मासूम रिश्तों की आड़ में धोखा खा कर ही
अपनी उम्र से पहले हो जाती है वो लड़की बड़ी
हैवानियत का नक़ाब पहचानते हैं जो अक्सर
करते हैं किसी पर ऐतबार फ़िर कभी नहीं

हालात के चलते अपने सच को वो भी
कहानी का लिबास पहनाना सीख गयी
अनुभव के दृष्टिकोण से देखते हैं जो अक्सर
भाँप लेते हैं तुम्हारी कहानी का सच तभी

हैरानी होती है उसे सुन कर दास्तान तुम्हारी
चेहरे अलग, किरदार अलग, मग़र कहानी वही
अपराध के ऊपर से पर्दा उठाते हैं जो अक्सर
जान लेते हैं इस ज़ालिम दुनिया में वो अकेले नहीं

इसलिए ख़ुद से शिकायत है तो बस इतनी ही
कि वक़्त रहते वो सच बयां न कर सकी।

© अपूर्वा बोरा​

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