सफ़र

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गहरी नींद
में होने के
बाद भी
कम्बल रजाई
की सौ परतों
के बाद भी
किसी तरह
तुम्हारे हाथ
मेरी कमर
तक का सफ़र
तय कर ही
लेते हैं

अक्सर सोचती
हूँ कितनी
आसानी से
मेरा सिर
तुम्हारी बाजुओं
से तुम्हारे सीने
तक का सफ़र
तय कर ही
लेता है

न जाने कैसे
घड़ी की सुई
की भांति करवटें
बदलने के बाद भी
सवेरे उठने तक
तुम और मैं
अक्सर एक दूसरे
की बाहों में खो जाने
तक का सफ़र
हर रात किसी तरह
तय कर ही
लेते हैं।

© अपूर्वा बोरा​

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