सफ़रनामा

बहुत भारी है दोस्त
ज़िन्दगी
ज़िम्मेदारी
जज़्बात
जुनून
जरूरतें
इनका बोझ
बहुत भारी है

तो तन्हाई में वक़्त ज़ाया करने से बेहतर
मैंने इस भार को पन्नों में बयाँ कर दिया
खुद को आज़ाद कर
मैंने अपनी डायरी को कैद कर दिया।
बहते लहू की स्याही बना
लो मैंने सफरनामा लिख दिया।

कुछ ख़्वाब हैं अधूरे से
कुछ रिश्तें हैं बिखरे से
कुछ बोल हैं अनकहे से
कुछ ज़ख़्म हैं गहरे से
कुछ शोर हैं ख़ामोश से
कुछ पल हैं ठहरे से
कुछ सुर हैं बेसुरे से
कुछ हौसले हैं बुलंद से
कुछ तुम हो थोड़े से
कुछ हम हैं पूरे से।

इस सफ़र में दोस्त
बस कुछ किस्से हैं पुराने से
और कुछ आज़ादी है ज़माने से।

आज डायरी को आज़ाद कर
लो मैंने तुम्हें कैद कर दिया
शब्दों की इक ढाल बना
लो मैंने सफ़रनामा पढ़ दिया।

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply