सफ़रनामा

Photo by Dariusz Sankowski on Unsplash

बहुत भारी है दोस्त
ज़िन्दगी
ज़िम्मेदारी
जज़्बात
जुनून
जरूरतें
इनका बोझ
बहुत भारी है

तो तन्हाई में वक़्त ज़ाया करने से बेहतर
मैंने इस भार को पन्नों में बयाँ कर दिया
खुद को आज़ाद कर
मैंने अपनी डायरी को कैद कर दिया।
बहते लहू की स्याही बना
लो मैंने सफरनामा लिख दिया।

कुछ ख़्वाब हैं अधूरे से
कुछ रिश्तें हैं बिखरे से
कुछ बोल हैं अनकहे से
कुछ ज़ख़्म हैं गहरे से
कुछ शोर हैं ख़ामोश से
कुछ पल हैं ठहरे से
कुछ सुर हैं बेसुरे से
कुछ हौसले हैं बुलंद से
कुछ तुम हो थोड़े से
कुछ हम हैं पूरे से।

इस सफ़र में दोस्त
बस कुछ किस्से हैं पुराने से
और कुछ आज़ादी है ज़माने से।

आज डायरी को आज़ाद कर
लो मैंने तुम्हें कैद कर दिया
शब्दों की इक ढाल बना
लो मैंने सफ़रनामा पढ़ दिया।

 © अपूर्वा बोरा

Leave a Reply

Close Menu