संदूक

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
बोझ बढ़ता जाता है
इसलिए कदम लडख़ड़ा रहे हैं
दिल हल्का करने के लिए कोई मिलता नहीं
इसलिए भार उठा रहे हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
संदूक में
एक यादों की चादर का
बिछौना फैला कर रखा है
उन कोनों से कहीं वो बातें न रिस जाएं
इसलिए गाँठें भी कस रहें हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
संदूक के
एक कोने में माँ के खाने का 
स्वाद छिपा कर रखा है
उन कोनों से कहीं वो जादू न रिस जाए
इसलिए गाँठें भी कस रहें हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
संदूक में
एक बचपन की इत्र को
छिड़क कर रखा है
उन कोनों से कहीं वो खुशबू न रिस जाए
इसलिए गाँठें भी कस रहे हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
संदूक के
एक कोने में अधूरे सपनों को
तह बना कर रखा है
उन कोनों से कहीं वो सपनें न रिस जाएं
इसलिए गाँठें भी कस रहें हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
संदूक में
एक बीता हुआ ज़माना
ढक कर रखा है
उन कोनों से कहीं वो वक़्त न रिस जाए
इसलिए गाँठें भी कस रहें हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
संदूक के
एक कोने में कहानियों को
संभाल कर रखा है
उन कोनों से कहीं वो किस्से न रिस जाएं
इसलिए गाँठें भी कस रहे हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं
बोझ बढ़ता जाता है
इसलिए कदम लडख़ड़ा रहे हैं
दिल हल्का करने के लिए कोई मिलता नहीं
इसलिए भार उठा रहे हैं

एक संदूक है
जिसे साथ लिए चल रहे हैं

 © अपूर्वा बोरा

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