संसार

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इस संसार में निर्लज्ज बहुत थे
मैं लाख़ ख़ुद को बचाती आई
कितने हाथों ने टटोला है इसे
ये बदन देगा इसकी गवाही

इस संसार में निष्ठुर बहुत थे
मैं कितना चीखी चिल्लाई
वे जिस्म नोंच कर तृप्त हुए
जिन्हें करनी थी अगुवाई

इस संसार में निर्दयी बहुत थे
मैंने लाख़ न्याय की गुहार लगाई
इंसानों के जंगल में शोर बहुत था
जो मेरी आवाज़ बाहर पहुँच न पाई

इस संसार में निर्मम बहुत हैं
मैं कितनी ख़बरें पढ़ते आई
मासूमियत के खरीददार मिल गए
और दुनिया भी पूर्ति करती आई
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वे बोले कि समय गुज़र जाने दो
किसी को भनक भी न पड़ जाने दो
बदन से जब निशान मिटने लगेंगे तो
स्मृति को वो सभी पल मिटा लेने दो
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चाहे वो छाप मस्तिष्क में अमिट रहे
चाहे दब ही जाओ उसके बोझ तले
चाहे दर्जनों की भीड़ में ये चलता रहे
जीवन यूँ ही व्यतीत करो बिना कुछ कहे
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वे बोले कि उस वक़्त क्यों ख़ामोश थी
जब रात गयी तो बात क्यों नहीं जाने दी
उकसाया होगा या दिखाई होगी अदा नई
वर्ना भले घर की लड़कियों संग ऐसा होता नहीं
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चाहे हर घर, उम्र, पीढ़ी की सीमा लांघे
अपराध फैलाता हो सर्वस्व अपनी बाहें
चलो जब तक घर की बात घर में ही दब जाए
हक़ीक़त की छींटाकशी से अपना दामन बचाये
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इस संसार में निर्लज्ज बहुत थे
मैं कितना अकेला समझते आई
एक कहानी से हौसला मिला और
फ़िर सैकड़ों कहानियां बाहर आईं

इस संसार में निडर बहुत हैं
मैं लाख़ कोशिशें करती आई
दरिंदगी का नक़ाब था हटाना
तब जा कर मैंने कलम उठाई

© अपूर्वा बोरा​

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