सीखती रही

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आँसूओं की नदी
अँखियों से बहती रही
धुँधली नज़रों से ही
तुम्हारी राह देखती रही
किसी और ने हाथ बढ़ाया नहीं
और मैं आँसू पोंछना सीखती रही

कोशिशें करते करते रोज़ कई
अपने आँसू ख़ुद पोंछना सीख ही गई

सन्नाटे की गूँज
ह्रदय में घर करती रही
नीरव ज़ुबान से ही
तुम्हारी बातें सुनती रही
किसी और ने ग़ौर फरमाया नहीं
और मैं सन्नाटा चीरना सीखती रही

कोशिशें करते करते रोज़ कई
सन्नाटे को चीरना सीख ही गई

चाहत की कमी
रिश्ते में यूँ घुलती रही
दिलोजान से ही
तुम्हारी आस करती रही
किसी और ने रिझाया नहीं
और मैं ख़ुद को चाहना सीखती रही

कोशिशें करते करते रोज़ कई
ख़ुद को चाहना सीख ही गई

उदासी की दशा
वेदना में सिमटती रही
फ़ीकी मुस्कान से ही
तुम्हारी ख़ुशी बनती रही
किसी और ने हँसाया नहीं
और मैं उदासी मिटाना सीखती रही

कोशिशें करते करते रोज़ कई
अपनी उदासी मिटाना सीख ही गई

मैं की तलाश
अक्सर हम में करती रही
यूँ भटकने से ही
तुम्हारी मंज़िल बदलती रही
किसी और ने साथ निभाया नहीं
और मैं अकेले जीना सीखती रही

कोशिशें करते करते रोज़ कई
आखिर मैं अकेले जीना सीख ही गई

© अपूर्वा बोरा​

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