शिकार

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फन फैलाए
हुए नाग
आहिस्ता
आहिस्ता
रेंगतें हैं
अपने शिकार
की ओर
और करते हैं
इंतज़ार
तब तक
जब तक
उनका शिकार
निश्चिंत न हो जाए
कि उसे कोई
ख़तरा नहीं
फ़िर सही मौके
की तलाश
पूर्ण होते ही
धर दबोचते हैं
उस निरीह जीव
को कपट से
घुटता जाता है
उसका दम
जैसे जैसे कसता
जाता है उसके
शरीर पर फंदा
देखते ही देखते
फड़फड़ाने लगते हैं
उसके प्राण जिसे देख
जगने लगती है
उन नागों की भूख और
नष्ट कर एक जीवन ही
फ़िर मिट पाती है ये भूख
.
.
नज़रें गड़ाए
हुए नर
आहिस्ता
आहिस्ता
भाँपते हैं
अपने शिकार को
और करते हैं
इंतज़ार
तब तक
जब तक
उनका शिकार
निश्चिंत न हो जाए
कि उसे कोई
ख़तरा नहीं
फ़िर सही मौके
की तलाश
पूर्ण होते ही
धर दबोचते हैं
उस निश्चल नारी को
छल कपट से
घुटता जाता है
उसका दम
जैसे जैसे कसता
जाता है उसके गले
पर हाथों का फंदा
देखते ही देखते
फड़फड़ाने लगती है
उसकी काया जिसे देख
जगने लगती है
उन नर की भूख और
नष्ट कर एक जीवन ही
फ़िर मिट पाती है ये भूख
.
.
इंसान होकर जानवर
सा स्वभाव करते हैं
ये कैसे नर हैं जो मादा
का ही शिकार करते हैं
.
.
फ़रेबी चेहरे पर
मासूमियत नुमां करते हैं
दरिंदे भी तो अब इंसानियत
का नक़ाब पहनते हैं
.
.
एक ही मिट्टी से बनते हैं
फ़िर उसमें ही मिल जाते हैं
कौनसी ऐसी भूख है जो
केवल नारी देह से मिटाते हैं
.
.
बराबर कहते ज़रूर हैं
मग़र सम्मान नहीं दे पाते हैं
आप अहंकार को ठेस लगते ही
क्यों हिंसा पर उतारू हो जाते हैं?
.
.
जो बच्चियों से लेकर प्रौढ़ाओं
तक को शिकार बनाते हैं
ये कैसे नर हैं जो दोष अब भी
नारी के ही सिर मढ़ते जाते हैं?
.
.
जो हार गया उसकी ख़ातिर
तो ख़ूब मशाल जलाते हैं
और जो बच गया उस पर
उंगली उठाने लग जाते हैं
.
.
शिकार गटक कर एक
ये फ़िर खोज में निकलते हैं
समाज की चुप्पी से ही ऐसे
अपराधी घर घर पलते हैं
.
.
नज़रें गड़ाए
हुए नर
आहिस्ता
आहिस्ता
भाँपते रहेंगे
अपने नए
शिकार को
और करेंगे
इंतज़ार
तब तक
जब तक

आप
और
मैं
आवाज़
नहीं
उठाते हैं

दोषियों
को
क़सूरवार
नहीं
ठहराते हैं

जो ख़ामोशी
हमें पुरखों
से विरासत
में मिली है
उसे आगे
नहीं
बढ़ाते हैं

जिस कहानी
को पीढ़ी दर
पीढ़ी जीते
आ रहे हैं
उस पर यहीं
पूर्ण विराम
लगाते हैं

आओ
अगली
पीढ़ी के
लिए एक
सुरक्षित
समाज
बनाते हैं

© अपूर्वा बोरा​

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