शिकायत

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तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे
कि मैं सब कुछ तुम्हें बताती नहीं
कि अपनी दुनिया तुम्हें दिखाती नहीं

जब भी तकिया आँसूओं से भिगाया करती हूँ
तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे

जब भी चोट के निशान छिपाया करती हूँ
तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे

जब भी अखबार पढ़ बौखलाया करती हूँ
तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे

जब भी अंधेरे में डर जाया करती हूँ
तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे

जब भी समाज से बग़ावत की बात करती हूँ
तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे

तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे
कि मैं सब कुछ तुम्हें बताती नहीं
कि अपनी दुनिया तुम्हें दिखाती नहीं।

पर कैसे बताऊं
कैसे बताऊं कि कुछ घटनाएं
नहीं लोग
नहीं हालात
नहीं वक़्त
नहीं मजबूरी
नहीं शिकवा
नहीं जज़्बात
नहीं विश्वासघात

नहीं जज़्बात
नहीं शिकवा
नहीं मज़बूरी
नहीं वक़्त
नहीं हालात
नहीं लोग
नहीं घटनाएं
ऐसा असर कर जाती हैं
जिन्हें शब्दों में बांधा नहीं जा सकता

तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे
कि मैं सब कुछ तुम्हें बताती नहीं
कि अपनी दुनिया तुम्हें दिखाती नहीं।

पर कैसे दिखाऊँ
कैसे दिखाऊँ कि कुछ घटनाएं
नहीं हादसे
नहीं संयोग
नहीं वार
नहीं कष्ट
नहीं पीड़ा
नहीं आपत्ति
नहीं विपत्ति

नहीं पीड़ा
नहीं कष्ट
नहीं वार
नहीं संयोग
नहीं हादसे
नहीं घटनाएं
ऐसा असर कर जाती हैं
जिन्हें देखकर महसूस नहीं किया जा सकता

तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे
कि मैं सब कुछ तुम्हें बताती नहीं
गर मैंने बता दिया
तो सुन पाओगे?

तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे
कि अपनी दुनिया तुम्हें दिखाती नहीं।
गर मैंने दिखा दिया
तो देख पाओगे?

जिन खबरों को कहानी की तरह पढ़ते हो तुम
जिन खबरों को किसी और की बदकिस्मती का नाम देते हो तुम
जिन खबरों को जानकर भी अनजान कर देते हो तुम

गर मैंने कह दिया
कि ये मेरी कहानी है
तो मान पाओगे?

तुम्हें अक्सर शिकायत रहती है मुझसे
कि अपनी शिकायतें तुम्हें सुनाती नहीं।
गर बयां न कर पाऊं
तो भी समझ पाओगे?

 © अपूर्वा बोरा

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