सुना है

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सुना है वो ज़माने से हमारी शिकायतें करता फिरता है
एक हम हैं जो उसके लबों से अपना ज़िक्र सुन मचल जाते हैं
 
वो गैरों की महफ़िलों में गुज़ारता है आजकल शाम
एक हम हैं जो उसके आने की उम्मीद से बहल जाते हैं
 
उसके बिस्तर पर करवटों की तरह बदलते हैं लोग भी
एक हम हैं जो उसकी यादों के चिराग तले जल जाते हैं
 
वो किसी भी वक़्त पुकारता है हमें लेकर हमारा नाम
एक हम हैं जो मीलों का ये फ़ासला नँगे पैर ही चल जाते हैं
 
उसकी बाहों में अक्सर होती हैं बाहें किसी और की
एक हम हैं जो उसके ख़याल से ही पिघल जाते हैं
 
वो पिलाता है ये मीठा ज़हर हाथों में भर कर जाम
एक हम हैं जो बंद आँखों से ये घूँट निगल जाते हैं
 
उसकी मोहब्बत फ़रेब है तो फ़िर ये फ़रेब ही सही
एक हम हैं जो फ़रेबी के नाम लिख ये ग़ज़ल जाते हैं
 
सुना है वो ज़माने से हमारी शिकायतें करता फिरता है
एक हम हैं जो उसके लबों से अपना नाम सुन मचल जाते हैं

© अपूर्वा बोरा​

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