स्वयं

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आईने से 
रूबरू हो
स्वयं ही
स्वयं के

क्लांत मुख
को देख
वो एकाएक
ठहर सी गई

जिस सांवले
रंग को
बचपन से 
हल्दी बेसन
और नींबू शहद
की अनेक
प्रकार की
विधियों का
लेप बना
यौवन की
आड़ में
पीछे छोड़ 
दिया था

वह 
गोरे गाल
आज 
प्रदूषण
और दिन 
भर की
थकन से
चूर 
स्याह रंगे
जा चुके हैं

इस रंग को
सुनते ही
नज़र पड़ी
उन आंखों पर
जो झील 
सी गहरी
कहलाती थीं
एक ज़माने
पहले इसके
ही हर
दीवाने से

वह
मृग नयन
आज
अनिद्रा
और काम के 
तनाव से 
चूर
काली घटा से
छा चुके हैं

इस वर्णन को
सुनते ही
ख़्याल आया
उन होठों का
जो गुलाब
से सुर्ख़
सुकोमल
नज़र आते थे
और हर
मुस्कान पर
जाने कितने
दिल लुटाते थे

वह
भीगे लब
आज
सिगरेट
और पानी की
कमी से
चूर
नीरस महफ़िल
सजा चुके हैं

आईने से 
रूबरू हो
स्वयं ही
स्वयं के

रूप
रंग
चेहरे
आँखों
और होठों के
बदलते
रुख़ को
देख

वो एकाएक
ठहर सी गई

फ़िर
स्वयं ही
स्वयं के

सपनों
अरमानों
रास्तों
मंज़िलों
और ज़िन्दगी के
बदलते 
रुख़ को
देख

वो एकाएक
संभल भी गई।

 © अपूर्वा बोरा

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