तब तक

Photo by cottonbro from Pexels
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यह एक काल्पनिक कृति है
इसकी वास्तविक व्यक्तिविशेष
या घटनाओं से किसी भी प्रकार
की समानता विशुद्ध रूप से
महज़ एक संयोग है
या नहीं

वो अपने बदन को
खरोंचती है
नोचती है
तब तक
जब तक
उसके नाखूनों में
अपना ख़ून
न रिस जाए
तब तक
जब तक
उसका अंतर्मन
गैर पर ऐतबार की
इज़ाज़त न दे जाए
तब तक
जब तक
उसके बदन से
तुम्हारे दाँतों के
निशान न मिट जाए
तब तक
जब तक
उसके रोम रोम से
तुम्हारे एहसास का
साया न हट जाए
तब तक
जब तक
उसके ख़ून से
तुम्हारे हाथों की
छाप न रंग जाए
तब तक
जब तक
उसके केशों में
तुम्हारी उंगलियों का
स्पर्श न बाकी रह जाए
तब तक
जब तक
उसकी कहानी से
तुम्हें आप धिक्कार
सुनाई न दे जाए
तब तक
जब तक
उसकी मासूमियत का
मख़ौल उड़ाना तुम्हारी
नींदे न उड़ा जाए
तब तक
जब तक
उसका मंज़र
वास्तविकता की
गवाही न बन जाए
तब तक
जब तक
उसकी ख़ामोशी
आने वाले तूफ़ान की
चेतावनी न बन जाए
तब तक
जब तक
उसके हालात
की बेड़ियों से वो
आज़ाद न हो जाए
तब तक
वो खरोंचती है
नोचती है
अपने बदन को
जब तक
उसके नाखूनों में
अपना ख़ून
न रिस जाए
तब तक
जब तक
मन के गुबार
उर के आक्रोश से
अपराधी कटघरे
में न आ जाए
तब तक
बस
तब तक

© अपूर्वा बोरा​

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