तदबीर

तेरी आदतों की आदत हो गई है
इन्हें छुड़ाने की तदबीर कोई बताये

तुझे बंद आँखों से पढ़ा है मैंने
बाहों में बिखरते सिमटते देखा है मैंने
तुझे ख़ामोश लम्हों में भी चाहा है मैंने
सोते-जागते, उठते-बैठते जाना है मैंने
तुझे ही नहीं तेरे ग़म को भी अपनाया है मैंने
तन्हाई को भी दहलीज़ से लौटाया है मैंने
तुझे भुलाने की कोशिश की कोशिश करता हूँ
इन लम्हों को भुलाने की तदबीर कोई बताये

तेरी आदतों की आदत हो गई है
इन्हें छुड़ाने की तदबीर कोई बताये

तुझे नींद से बैर मोल लेते देखा है मैंने
ख़यालों की उलझनों को बूझा है मैंने
तुझे अपने हिस्से का सुख दिया है मैंने
बदले में तेरे हिस्से का ग़म लिया है मैंने
तुझे इस कदर अपना बनाया है मैंने
कि सजदे में भी सिर झुकाया है मैंने
तेरे आने की उम्मीद की भी उम्मीद करता हूँ
इन्हें झुठलाने की तदबीर कोई बताये

तेरी आदतों की आदत हो गई है
इन्हें छुड़ाने की तदबीर कोई बताये

तुझे ख़ुद ही से लड़ते देखा है मैंने
इन राहों में हाथ थामा है मैंने
तुझे बहुत क़रीब से जाना है मैंने
हर मिज़ाज़ का ज़ायका चखा है मैंने
तुझे ही नहीं तेरी हर आदत को चुना है मैंने
अधूरी ही सही इस दास्तां को बुना है मैंने
तुझे यादों से छिपकर कभी याद करता हूँ
इन्हें मिटाने की तदबीर कोई बताये

तेरी आदतों की आदत हो गई है
इन्हें छुड़ाने की तदबीर कोई बताये

तुझे हर रोज़ दुआओं में माँगा था मैंने
अब की तेरी सलामती की दुआ है मैंने
बातों के सिलसिले ठहर गये तो क्या
रातों को जागकर तेरा ही नाम पुकारा है मैंने
बातों के सिलसिले ठहर गये तो क्या
तुझे फ़ासलों के दरमियां भी चाहा है मैंने
तेरी ख़्वाहिश की ख़्वाहिश अब भी करता हूँ
इन्हें समझाने की तदबीर कोई बताये

तेरी आदतों की आदत हो गई है
इन्हें छुड़ाने की तदबीर कोई बताये

© अपूर्वा बोरा​

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