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न जाने कितनी रातें मैं किताबों के संग बिताती हूँ इस आस में कि बाबा की कहानियां ख़ुद दोहरा सकूँ लेटती हूँ जब बिस्तर में तो सताते हैं कल के ख़याल और इस उलझे हुए जाल को मैं सुलझा नहीं पाती मिन्नतें करती हूँ कई बार मग़र वो नज़दीक नहीं बुलाती कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

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वक़्त कितना जल्दी बीत गया जिसकी डाँट से डर लगता था अब उसकी चुप्पी से घबरा जाती हूँ देख न माँ तुझसे दूर रहकर भी मैं तुझे ख़यालों में करीब पाती हूँ

Continue Reading देख न माँ