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ये काले घेरे शायद मेरी आँखों से गहरे हैं अब तो रातें करवटों के बीच गुज़र जाती हैं सुकून और मेरे बीच न जाने कितने पहरे हैं

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ख़ामोश हो गया है वो जो था मुझे सब कुछ बताने वाला बातें याद रखता था जो अब बन गया है उन्हें भुलाने वाला नाराज़ हो गया है वो जो था हरदम मुझे मनाने वाला बाहों में था जो अब बन गया है यादों में समाने वाला

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फिसला होता तो तुम हाथ दे शायद मुझे संभाल पाती मग़र ज़िंदगी की डगर मेरे हालातों के कारण थोड़ी ऊबड़खाबड़ है एकाएक मौसम के बिगड़ जाने से मैं जो गिर पड़ा हूँ अब तमाम ज़िंदगी खुद को उठाने में व्यतीत हो जाएगी फिसला होता तो तुम हाथ दे शायद मुझे संभाल पाती मगर जो हालातों से हार गया तुम कैसे उसे बचा पाती?

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आँखों से जो दिख जाता मिरे दिल का नासूर आप बेवफ़ाई के तमगे से यूँ नवाज़ते नहीं जो खेलते हैं ये दांव ख़ुद को कहकर मजबूर वाहवाही के लिये महफ़िलों को यूँ सुनाते नहीं इंसाफ के कटघरे में खड़ा कर गिनों मिरे क़सूर बेक़सूर अपनी ज़िन्दगी की दास्तां यूँ बताते नहीं

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रात के अंधेरे में निकली जगमग जुगनुओं की बारात क़सूर था बादलों का जिसने ढाँप लिया पूरा आसमान और हमने बेवज़ह ही चाँद के फ़र्ज़ पर लगा दिया इल्ज़ाम

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मैं अकेली नहीं हूँ ये आवाज़ें हैं ना रात के सन्नाटे में धीरे से कान में फुसलाकर मुझे नाम लेकर पुकारा करती हैं

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सुना है वो ज़माने से हमारी शिकायतें करता फिरता है एक हम हैं जो उसके लबों से अपना ज़िक्र सुन मचल जाते हैं वो गैरों की महफ़िलों में गुज़ारता है आजकल शाम एक हम हैं जो उसके आने की उम्मीद से बहल जाते हैं

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दिल में जगह दी थी जिसे उसने बिन दस्तक बिन आवाज़ कल रात घर ख़ाली कर दिया उसके दिए हुए उम्मीद के फ़ूल अभी भी मेज़ पर सजे हुए हैं ऐसी किस हड़बड़ी में वो था जो इस गुलदस्ते को यहीं छोड़ गया शायद नए फूल खरीदने निकला था और मुझे इत्तिला करना भूल गया शायद बाहर टहलने निकला था और घर का रास्ता भूल गया शायद? शायद।

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हम नज़रों के खेल को इश्क़ का नाम दे बैठे आपने तो गुज़ारी केवल एक शाम हमारे साथ हम उस शाम के सहारे पूरी ज़िन्दगी बिता बैठे

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वक़्त कितना जल्दी बीत गया जिसकी डाँट से डर लगता था अब उसकी चुप्पी से घबरा जाती हूँ देख न माँ तुझसे दूर रहकर भी मैं तुझे ख़यालों में करीब पाती हूँ

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