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आओ तोलते हैं अपना ईमान इस तराजू पर सुना है बेईमानों को नये ख़िताब मिल रहे हैं ज़रा झाँककर देखते हैं अपने गिरेबान में भी अपने भी तो बीते कल के दाग़ दिख रहे हैं

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पीढ़ी दर पीढ़ी फ़िर यही किस्सा दोहराया जाता है रिश्ते नाते समाज की आड़ में कोई अपराध छिपाया जाता है

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तुमने मेरी कविताएं पढ़ी हैं मेरी आत्मकथा के अंश नहीं इन किस्सों में मेरे अतीत के हिस्से इन किरदारों में लोगों के चेहरे और इन कहानियों में यथार्थ की झलक देखने की नाक़ाम कोशिश न करो सवाल हैं तो पूछने का हौसला रखो ख़ुद ही जवाब देने हैं तो अलग बात है

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