तलब

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कि तलब उठती
है उसे जब तेरे
एहसास की
वो चुपचाप एक
सिगरेट होंठों में
दबा लेता है और
जला देता है उस
तलब की आड़
में ख़ुद को धीरे धीरे

और जब दुनिया
कहती है देखो कैसा
दीवाना बन गया है
तलब उठती है उसे भी
कि कोई तुझे भी तो
दीवानी का दर्ज़ा दे और उस
तलब की आड़ में
महज़ किलस कर रह
जाता है धीरे धीरे

और जब थर्रा उठता है
उसका तन बदन तेरे
एक विचार से तो
तलब उठती है उसे भी
कि तेरा ख़याल भी उसे
थरथरा सके और उस
तलब की आड़ में
तन्हाई को सहारा देने
लगता है धीरे धीरे

और जब पर्याप्त
नहीं होता है कुछ भी
तो घर करने लगती है
फ़िर एक तलब कि
काश तेरी कमी फ़िर
एक बार भर सके और उस
तलब की आड़ में
फ़िर सुलगाने लगता है
वो ख़ुद को एक और सिगरेट
के सहारे धीरे धीरे।

© अपूर्वा बोरा​

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