तेरा चेहरा

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मदमस्त फ़िज़ाओं में तेरा ही चेहरा दिखता था
इस दिल पर ज़ोर फ़िर कहाँ चलता था

वो स्याह रातें और महबूब के वो स्याह होंठ
मैं ख़यालों में मुसलसल आप ही पिघलता था

इन मसलों में हक़ीमों का भला क्या काम
जो कम्बख़्त दिल तेरे दीदार को मचलता था

नाउम्मीदी के अंधकार में डूबा हुआ है बाकी जहां
मेरे मकां में एक उम्मीद का ही चराग़ जलता था

अरे मुसाफ़िर रास्ता भटके तो कोई गरज़ नहीं
मग़र तेरा राह भुला देना हमें बड़ा ख़लता था

हमसे अक़्सर टकरा जाता है वो शामों में आये दिन
जाने किसका पता इस गली से होकर निकलता था

आसमां भी उसका, चाँद तारे कहकशां भी उसके
हमारा तो सूरज भी पूरब दिशा में ढलता था

इन्हीं हाथों से दफ़नायी है हमारी दास्तां ए इश्क़
इस क़ब्रिस्तान में भी एक हसीं ख़्वाब पलता था

बंजारे ने ख़ुदा से माँगा भी क्या एक तेरे सिवा
नसीब के आगे भी किसका ज़ोर चलता था

मौसम बदले, लोग बदले, ये वक़्त भी बदल गया
बस एक ये नज़ारा बदलते न बदलता था

मदमस्त फ़िज़ाओं में तेरा ही चेहरा दिखता था
इस दिल पर ज़ोर फ़िर कहाँ चलता था

© अपूर्वा बोरा​

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