ठीक हो?

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घर से फ़ोन आता था
मैं आफिस में व्यस्त रहती थी
दस मिनट की देरी में
करीबन पचास मिसकॉल
व उतने ही मैसेज आने से
मेरे मोबाइल की स्क्रीन
जगमगा उठती थी

आधे फ़ोन माँ के व
आधे बाबा के व बाकी
बुआ मिलाया करती थी
एक पंक्ति से, कहाँ हो
फोन क्यों नहीं उठा रही
सब ठीक तो है ना
जैसे अनगनित प्रश्न देख
मैं अक्सर झुंझला उठती थी

अपने साथी से यह कहते
हुए कि मेरे परिवार को
भी कितनी बेचैनी रहती है
मैं फ़ोन घुमाती जिसे
एक घण्टी में वे उठा लेते और
आवाज़ सुनाई पड़ती कि
ठीक हो?हमें चिंता हो रही थी
मैं भी कह बैठती थी
कि किस बात की चिंता
काम कर रही हूँ और थोड़ी
ही देर में घर पहुँच जाऊंगी
इतना भी परेशान मत हुआ करो

बीते दिन खबरों में पढ़ा
एक ही दिन में देश के
हर कोने में
छेड़छाड़
उत्पीड़न
बलात्कार
सामूहिक बलात्कार
हत्या
की दर्दनाक वारदात
घट रही है

घर से फ़ोन आया था
मैं आफिस में व्यस्त तो थी
मगर कॉल मिस नहीं की
आवाज़ सुनाई पड़ी कि
ठीक हो?

घर से फ़ोन आया था
मगर मैं यह न कह सकी
कि किस बात की चिंता

घर से फ़ोन आया था
मगर मैं यह न कह सकी कि
अभी तक काम कर रही हूँ

घर से फ़ोन आया था
मगर मैं यह न कह सकी कि
थोड़ी ही देर में घर पहुंच जाऊंगी

घर से फ़ोन आया था
मगर मैं यह न कह सकी कि
इतना भी परेशान मत हुआ करो

सच तो यह है कि घर से
निकलने से लेकर वापिस
लौटने तक मेरी सुरक्षा
मेरे बस में नहीं और
अपने परिवार को झूठी
दिलासा व उम्मीद देने का
अब मुझमें भी साहस नहीं।

 © अपूर्वा बोरा

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