ठीक नहीं है

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घर पहुँचते ही
बिखर जाती है
वो कांच सी
और रात गुज़ारती है
खुद को समेटते समेटते
शरीर के जिस भाग
पर धड़कन महसूस
हुआ करती है वहाँ
आजकल शून्यता
घर कर चुकी है
दफ़्तर ठीक है
परिवार भी ठीक है
पर कुछ तो है जो
ठीक नहीं है

एक मुलाक़ात में
किसी का तुम पर
इतना असर कैसे
हो सकता है कि
तुम्हें होश और
मदहोशी का फ़र्क
कुछ समझ न आये

एक अजनबी की
उस मुस्कुराहट का
इतना असर कैसे
हो सकता है कि
तुम्हें स्वप्न और
यथार्थ का फ़र्क
कुछ समझ न आये

एक स्पर्श का
इतना असर कैसे
हो सकता है कि
तुम्हारी चाहत और
ज़रूरत का फ़र्क
कुछ समझ न आये

घर पहुँचते ही
उलझ जाती है
वो ऊन के धागों सी
और रात गुज़ारती है
खुद को सुलझाते सुलझाते
शरीर के जिस भाग
पर शून्यता महसूस
हो रही थी वहाँ
आजकल जज़्बात
घर कर चुकें हैं
दफ़्तर ठीक है
परिवार भी ठीक है
पर कुछ तो है जो
ठीक नहीं है

शायद एक मुलाक़ात
एक अजनबी
और एक स्पर्श का
इतना असर हो सकता है
कि सब कुछ ठीक तो हो
पर फ़िर भी कुछ ठीक न लगे।

© अपूर्वा बोरा​

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