तो कैसे

तू तो किनारे के उस पार खड़ा था
मैं आवाज़ लगाता भी तो कैसे

शोर लहरों का था या अंतर्मन का
हाल बेहाल था ये बताता भी तो कैसे

न कदम कभी ठहर सके न हम
मुसाफ़िर साथ निभाता भी तो कैसे

उत्कंठा का भंवर सा उठ रहा है
ख़ुद से ख़ुद को बचाता भी तो कैसे

ग़ैर सा शक़्स घर कर गया है भीतर
आईने से नज़रें मिलाता भी तो कैसे

बदलते हैं वक़्त, लोग और हालात मग़र
हारे हुए इंसान को जिताता भी तो कैसे

समंदर से कहो कि आगोश में समा ले
ज़िंदगी का उधार चुकाता भी तो कैसे

हादसों के शिकार इस जीवन का
कोई बोझ उठाता भी तो कैसे

मैं तो जा चुका था
तू हक़ जताता भी तो कैसे
मुझे बुलाता भी तो कैसे
आवाज़ लगाता भी तो कैसे

© अपूर्वा बोरा​

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