तो तुम

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मेरी आँखों से नाउम्मीदी झलके किसी रोज़
तो तुम बाबा की मुस्कान मुझे दिखाना
जो कोशिश करते करते हार मानने लगूँ
तुम उनके फ़लसफ़े मुझे सुनाना

मेरी आँखों से आँसू छलके किसी रोज़
तो तुम माँ का आँचल मुझे ओढ़ाना
जो बिस्तर में उनका अक्स खोजने लगूँ
तुम उनकी ख़ुशबू कहीं से ढूंढ़ लाना

मेरी आँखों से नींद रूठे किसी रोज़
तो तुम बुआ की लोरी मुझे सुनाना
जो रैना जाग जाग कर बिताने लगूँ
तुम उनकी थपकी याद दिलाना

मेरी आँखों के ख़्वाब टूटे किसी रोज़
तो तुम दी का आत्मविश्वास मुझे सिखाना
जो भविष्य के डर से वर्तमान भुलाने लगूँ
तुम उनके संघर्षों के बरस गिनाना

मेरी आँखों का नूर ढले किसी रोज़
तो तुम महबूब से मुझे मिलाना
जो उदासी गले लगाने लगूँ
तुम उनकी मोहब्बत से बहलाना

मेरी आँखों से ये झलके किसी रोज़
तो तुम ये उम्मीद मुझे दिखाना

© अपूर्वा बोरा​

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