तू नहीं

तू नहीं
तेरा ख़याल सही
मेरा मुझमें
अब क्या ही
बाकी है
तू नहीं तो
तेरे होने का
महज़ एहसास ही
काफ़ी है

तू नहीं
तेरी खुशबू सही
मेरे ज़हन में
तेरा स्पर्श अब भी
बाकी है
तू नहीं तो
तेरे होने का
महज़ एहसास ही
काफ़ी है

तू नहीं
तेरा ख़्वाब सही
एक उम्मीद की
किरण अब भी
बाकी है
तू नहीं तो
तेरे होने का
महज़ एहसास ही
काफ़ी है

तू नहीं
तेरी खामोशी सही
मुझमें मोहब्बत
का अंश अब भी
बाकी है
तू नहीं तो
तेरे होने का
महज़ एहसास ही
काफ़ी है

तू नहीं
तेरा ख़याल सही
मेरा मुझमें
अब क्या ही
बाकी है
तू नहीं तो
तेरे होने का
महज़ एहसास ही
काफ़ी है।

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply