तुम होते तो

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तुम होते तो अलग बात होती
सवेरे की अदरक वाली चाय
पर हमारी गुफ़्तगू कमाल होती
मैं अपनी कविताएं पढ़ती तो
तुम्हारी कहानियां भी साथ होती
तुम होते तो अलग बात होती

तुम होते तो अलग बात होती
सभी प्रेम रस में डूबे गीतों पर
हमारी जुगलबंदी कमाल होती
मैं गानों का मिज़ाज़ बदलती तो
तुम्हारी छेड़छाड़ भी साथ होती
तुम होते तो अलग बात होती

तुम होते तो अलग बात होती
मेरे महीने के उन दिनों में लाड़
प्यार की बरसात कमाल होती
मैं दर्द का सफ़र तय करती तो
दी हुई चॉकलेट भी साथ होती
तुम होते तो अलग बात होती

तुम होते तो अलग बात होती
प्यार की राह से घबराते नहीं तो
ज़माने से बग़ावत कमाल होती
मैं आग के दरिया में डूबती तो
तुम्हारी मोहब्बत भी साथ होती
तुम होते तो अलग बात होती

तुम होते तो अलग बात होती
तुम्हारे आग़ोश में खो कर ही
नींद से मुलाकात कमाल होती
तुम्हारे सीने पर सिर रखती तो
आसान शायद हर रात होती
तुम होते तो अलग बात होती

तुम होते तो अलग बात होती
जज़्बातों को शब्दों में बाँध कर
लिखने की कोशिश कमाल होती
तुम्हारी कमी जब भी खलती तो
यादों की बारात ही साथ होती
तुम होते तो अलग बात होती

शायद ये फ़ासला मिटाने की
आखिरी आज़माइश होती
गर क़ैद ही रहना है उम्र भर तो
तेरे ही पिंजरे की ख़्वाइश होती
तुम होते तो कुछ ऐसी बात होती
तुम होते तो कुछ वैसी बात होती
तुम होते तो कुछ अलग बात होती

© अपूर्वा बोरा​

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